कहानी पूरी सियासी है….रामगढ़ में इन दिनों एक सियासी जमात की एक विंग में ताजपोशी को लेकर कवायद बड़ी जोरो शोरो से चल रही है।वहीं अब इसी विंग की बड़े रंगरूटो की फेहरिस्त सामने आने के बाद अब रामगढ़ में इस विंग को लेकर सियासत तेज होती दिखाई दे रही है।जो कल तक दोस्त थे और जिनकी दोस्ती की मिशाल दी जाती थी… हो सकता है कि इस सियासी उथल-पुथल के बाद दोस्ती शोले के जय-वीरू की बजाय सौदागर फिल्म के वीरू (दिलीप कुमार) और राजेश्वर सिंह (राज कुमार) जैसी दुश्मनी में बदल जाए। क्योंकि राजनीति में कब दोस्त ही अपने जिगरी दोस्त पीठ में खंजर चला कर ईलू -ईलू कर दे पता ही नही चलता।क्योंकि अक्सर कहा जाता है राजनीति में न दोस्ती स्थाई न दुश्मनी दिल्ली वाली तस्वीर तो आपने देख ली होगी उस पर चर्चा फिर कभी लेकिन…
चर्चा है कि रामगढ़ की राजनीति में जय-वीरू जैसी मशहूर जोड़ी में आने वाले दिनों में दरार पड़ने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।इस बात को समझने के लिए शोले के फ्लैशबैक में आपको जाना पड़ेगा कुछ क्षणों के किए, जिस तरह शोले फिल्म में भले ही जय-वीरू दोनों मुख्य किरदार में थे लेकिन इस फ़िल्म के प्रशंसको का एक बड़ा तबका जय को ही लीड हीरो मानता है। वीरू कभी पानी की टंकी पर चढ़ जाता था तो कभी भोलेनाथ के मंदिर के पीछे से भगवान की आवाज निकालता था। वीरू थोड़ा शरारती था। याद होगा कि जब बसंती की मौसी से शादी की बात करने की बारी आई थी तो वो जय ही था जो अपने दोस्त वीरू की पैरवी करने मौसी के पास गया था। इस रामगढ़ में भी लगभग यही वाक्या लोगो ने डेढ़ दो साल पहले देखा ही होगा।लेकिन आज वही वीरू आज जय की राजनैतिक कब्र खोदने में आमादा हो चुका है।
क्या जय की होगी सियासी शहादत या वीरू को मिलेगी मात
पुरानी वाली शोले फिल्म के क्लाइमेक्स में जय, गाँववालो और वीरू को बचाने के लिए गब्बर के गुंडों से भिड़ जाता है और अंत मे उसकी गोली लगने से मौत हो जाती है। वीरू बसंती के साथ अपना घर बसा लेता है और गब्बर जेल चला जाता है…लेकिन इस रामगढ़ की जय-वीरू की जोड़ी में भी अब यही क्लाइमेक्स वाला सीन दोहराए जाने का ताना बाना वीरू बुन रहा है। लेकिन अब जय गाँव वालों को गब्बर से बचाना तो चाह रहा है लेकिन अपनी कुर्बानी देकर नही जय को पता है कि रामगढ़ में उसके खूब प्रशंसक है। हालांकि जय के चाहने वाले रामगढ़ के अलावा रियासत के अन्य लेकिन गब्बर से लड़ते लड़ते जय थक चुका है। जय चाह रहा है कि उसकी पसंद का रंगरूट को कमान दे दी जाए, लेकिन वीरू सियासी जमावट को देखते हुए कुछ अलग ही करने के मूड में नजर आ रहें है।
तो क्या आने वाले कुछ ही दिनों में कुछ ऐसा होने वाला है,जिसमे वीरू जय को दरकिनार कर खुद की सियासत चमकाने के लिए इस विंग को समझौता विंग बना न दें। रमेश सिप्पी की शोले से ज्यादा इस नई शोले में बड़ा क्लाइमैक्स आने वाला है।आने वाले समय मे आप देखेंगे
- क्या जय वीरू की दोस्ती में बड़ी दरार पड़ने वाली है ?
- क्या जय अपने मंसूबों में कामयाब हो जाएंगा ?
- या वीरू की राजनीति जय और उनके नूर-ए-नज़र को ले डूबेगी ?
- क्या जय इस बार वीरू की बातों में या झांसे में न पड़कर अपने पसंद की ताजपोशी करवा लेगा ?
कुछ कहा नही जा सकता क्या होगा लेकिन रामगढ़ की गली गली में जय वीरू की इस संभावित टकराहट की चर्चा है। खुली जुबान से कोई नाम लेकर नही बात कर रहा है क्योंकि रमेश सिप्पी की शोले के वीरू की तरह इस रामगढ़ वाला वीरू भी बात-बात में तमतमा जाता है। हालांकि तमतमाहट चार दिन की चांदनी है….


